रविवार, 24 मई 2009
आक्सीजन की कमी से मरीं मछलियां
हेमन्त कुमार पाठक, गोरखपुर महानगर स्थित रामगढ़ ताल में पिछले दिनों मछलियों की मौत आक्सीजन की कमी से हुई। पर्यावरण एवं लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण प्रयोगशाला में हुई ताल के पानी के नमूनों की जांच में यह बात साबित हो चुकी है। जांच में मछलियों की मौत किसी जहरीले रसायन या बीमारी से होने की बात भी सिरे से खारिज हो गयी है। विगत चार मई को रामगढ़ ताल में हुई भारी तादाद में मछलियों की मौत ने विशेषज्ञों को चिन्ता में डाल दिया। इसी के साथ मछलियों की मौत के कारणों को जानने की गम्भीर पहल शुरू हुई। मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज के प्रोफेसर गोविन्द पाण्डेय कालेज के निर्देशन में एम.टेक. पर्यावरण अभियंत्रण के दो छात्रों राहुल श्रीवास्तव व भाष्कर शुक्ल ने ताल के जल के दो नमूने लेकर जांच शुरू की। जांच के नतीजे चौंकाने वाले और तमाम दावों से कुछ अलग रहे। इस सम्बन्ध में डा. गोविन्द पाण्डेय ने जैविक प्रदूषण के फल स्वरूप ताल में घुलित आक्सीजन की मात्रा को मछलियों की मौत का जिम्मेदार बताया। डा. पाण्डेय के अनुसार मछलियों की मौत के दिन ताल के जल के जो दो नमूने लिये गये थे, जांच के बाद उनमें घुलित आक्सीजन की मात्रा 2.6 एवं 2.8 प्रति लीटर मिली जबकि पी.एच. 10.2 पाया गया। डा. पाण्डेय ने बताया कि मानकों के अनुसार मछलियों के जीवन के लिये जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा न्यूनतम 4 मिलीग्राम प्रति लीटर अवश्य होनी चाहिये। दिन में शैवालीय प्रकाश संश्लेषण के कारण जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा अधिकतम होती है। परन्तु ताल में गिरने वाले अपजल एवं जैविक पदार्थो के विघटन एवं जलकुम्भी सड़ने के कारण इसकी मात्रा में कमी आती है। वर्तमान में ताल में जल में शैवाल एवं जल कुम्भी की प्रचुरता है। जल का तल जलकुम्भी से ढका होने के कारण प्रकाश संश्लेषण भी प्रभावित होता है। डा. पाण्डेय के अनुसार तीन-चार मई की रात में जलीय जीव-जन्तुओं एवं शैवालीय तथा अन्य पादपों के श्वसन के कारण ऐसा संभव है कि जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा मछलियों की मात्रा मछलियों के जीवन के लिये आवश्यक न्यूनतम मात्रा से भी कम हो गयी होगी। उस रात आयी आंधी के कारण ऐसा संभव है कि जल के सतह के ऊपर हवा का दवाब कम होने के फलस्वरूप झील की उथली गहराई से तलछट उठकर ऊपर आ गयी होगी, जिससे फलस्वरूप घुलित आक्सीजन का तेजी से अवशोषण हुआ होगा। डा. पाण्डेय ने कहा कि यद्यपि मृत मछलियों का अन्त्य परीक्षण करा कर मृत्यु के कारणों की पुष्टि करायी जानी चाहिये, फिर भी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों एवं उनके द्वारा लिये गये नमूनों में घुलित आक्सीजन की मात्रा में कमी पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि मछलियों की मौत घुलित आक्सीजन की कमी के कारण हुई होगी। उन्होंने ऐसे तमाम दावों प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा कि न जाने यह किस आधार पर यह कहा जा रहा है ताल के जल में आक्सीजन की मात्रा 10 मिलीग्राम प्रतिलीटर से ऊपर थी और मछलियों की मौत विषैले रसायन के कारण हुई।
सोमवार, 18 मई 2009
विनोद शुक्ल नही रहे
हिंदी पत्रकारिता में धार व धाक, आंदोलन-अभियान, प्रयोग-प्रखरता, जवाबदेही और जुनून के प्रबल पक्षधर विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे। दैनिक जागरण, लखनऊ के पूर्व स्थानीय संपादक श्री शुक्ल ने सोमवार सुबह संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतिम सांस ली जहां रविवार को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें भर्ती कराया गया था। लंबे कालखंड तक उनकी कर्मभूमि रही कानपुर में पवित्र गंगातट पर शाम को उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके शोकसंतप्त परिवार में पत्नी, पुत्र और पुत्री हैं। वाराणसी के एक साहित्यिक-संस्कारी परिवार में 19 नवंबर, 1941 को जन्मे श्री शुक्ल ने 1963 में दैनिक आज वाराणसी से वास्तविक अखबार प्रबंधन का सफर शुरू किया और करीब 45 वर्षो बाद वर्ष 2008 में दैनिक जागरण, लखनऊ के स्थानीय संपादक पद से सेवानिवृत्त हुए। साढ़े चार दशक का ये कालखंड उनके लिए सतत अभियान जैसा रहा। दरअसल उन्होंने पूरा जीवन ही अभियान पुरुष की तरह जिया, वह कभी रुके नहीं, थके नहीं। उनके लिए वास्तविक अखबार प्रबंधन का शब्द प्रयोग इसलिए किया जाना चाहिए कि खबर से लेकर विज्ञापन, प्रसार, छपाई की तकनीक सरीखी अखबार प्रबंधन की हर विधा में उन्होंने अपनी क्षमता और स्वप्नशीलता से खुद को पारंगत सिद्ध किया। आज और दैनिक जागरण की तमाम शाखाओं-प्रशाखाओं की स्थापना में वह सक्रिय माध्यम रहे। वह अपनों के भैया थे और उनके लिए पराया तो कोई था ही नहीं। भीड़ में प्रतिभा को पहचान लेते थे, प्रतिभा में छिपी विशिष्टता को जान लेते थे और विशिष्टता को सही दिशा में सान (धार) देते थे। उनके हाथों गढ़े गए असंख्य होनहार आज पत्रकारिता जगत में हस्ताक्षर और हस्ती का विशेषण धारण किये हुए हैं। यही वजह है कि हिंदी पत्रकारिता को जनोन्मुखी आंदोलन की शक्ल देने के लिए उनके द्वारा किये गए प्रयोगों की छाप दैनिक जागरण समूह के अलावा उन तमाम हिंदी अखबारों में भी देखी जाती है, जहां उनके सान्नि्ध्य में सीख लेने वाले तमाम प्रशिक्षु, संपादकों-प्रबंधकों के दायित्व निभा रहे हैं। वह संस्कार व परंपरा के प्रबल आग्रही थे, तो नई तकनीक व परिकल्पना के चितेरे। आपातकाल, अयोध्या विवाद, तथा चंबल के बीहड़ों में दस्यु समर्पण संबंधी आपरेशनों में अखबारी सरोकारों को लेकर उनकी सक्रिय संवेदनशीलता अविस्मरणीय है। देश भर में दैनिक जागरण के कार्यालयों में शोक सभाओं के जरिए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये गए।
सूदखोरों की जकड़ में हैं शहर के सैकड़ों परिवार
नवनीत प्रकाश त्रिपाठी, गोरखपुर
शहर के सैकड़ों परिवार सूदखोरों के बुने ताने-बाने में बुरी तरह से जकड़े हुये हैं। अपनी ऊंची रसूख और पैसे के बल पर वसूली के लिये ये रोज नियम, कानून की धज्जियां उड़ाते हैं। यही नहीं सूदखोरों द्वारा वसूली के लिये हर जायज, नाजायज तौर तरीकों का प्रयोग किया जाता है। सूदखोरों को उन नेताओं और माफियाओं द्वारा पूरा समर्थन दिया जाता है जो इस धंधे में पैसा लगाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। पता नहीं क्यों उनकी इन हरकतों पर प्रशासन खामोशी अख्तियार किये है। रेलवे के सिग्नल वर्कशाप में कार्यरत विनोद कुमार सिंह की शनिवार को सूदखोर और उसके साथियों द्वारा खुलेआम पिटाई और बाद में गोली मार कर उसकी हत्या करने की कोशिश के बाद शहर में बड़े पैमाने चल रहा यह गोरखधंधा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पता चला है कि किस तरह सूदखोर कर्जदारों से मनमाने दर से ब्याज वसूल करते हैं। बताते हैं कि धंधेबाज लिखा पढ़ी में तो बंैक के ब्याज दर पर उधार देते हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर इन सूदखोरों द्वारा 50 से 150 प्रतिशत तक ब्याज वसूला जाता है। सबसे बड़ी बात यह कि इस धंधे का बहुत अधिक काम मौखिक रूप से होता है। हालांकि सूदखोरों द्वारा कर्ज लेने वालों पर दबाव बनाने के लिये स्टैंप पेपर पर लिखित ले लिया जाता है और गंभीर तथा डरावनी शर्ते थोप दी जाती हैं। वैसे तो सूदखोरों का जाल नगर निगम तथा अन्य संस्थानों में फैला हुआ लेकिन रेलवे में इस कारोबार की जड़ें कितनी गहरी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। वेतन दिवस पर सूदखोरों द्वारा कर्जदारों से वसूली के लिए किया जाने वाला तांडव किसी से छिपा नहीं है। रेलवे सुरक्षा आयुक्त रहे डीआईजी बृजलाल ने अपने कार्यकाल में सूदखोरों के खिलाफ अभियान चलाकर इसके कारोबारियों पर अंकुश लगाने का सार्थक प्रयास भी किया लेकिन उनके यहां से जाने के बाद सूदखोर फिर पहले वाली स्थिति में पहंुच गये हैं।
शहर के सैकड़ों परिवार सूदखोरों के बुने ताने-बाने में बुरी तरह से जकड़े हुये हैं। अपनी ऊंची रसूख और पैसे के बल पर वसूली के लिये ये रोज नियम, कानून की धज्जियां उड़ाते हैं। यही नहीं सूदखोरों द्वारा वसूली के लिये हर जायज, नाजायज तौर तरीकों का प्रयोग किया जाता है। सूदखोरों को उन नेताओं और माफियाओं द्वारा पूरा समर्थन दिया जाता है जो इस धंधे में पैसा लगाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। पता नहीं क्यों उनकी इन हरकतों पर प्रशासन खामोशी अख्तियार किये है। रेलवे के सिग्नल वर्कशाप में कार्यरत विनोद कुमार सिंह की शनिवार को सूदखोर और उसके साथियों द्वारा खुलेआम पिटाई और बाद में गोली मार कर उसकी हत्या करने की कोशिश के बाद शहर में बड़े पैमाने चल रहा यह गोरखधंधा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पता चला है कि किस तरह सूदखोर कर्जदारों से मनमाने दर से ब्याज वसूल करते हैं। बताते हैं कि धंधेबाज लिखा पढ़ी में तो बंैक के ब्याज दर पर उधार देते हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर इन सूदखोरों द्वारा 50 से 150 प्रतिशत तक ब्याज वसूला जाता है। सबसे बड़ी बात यह कि इस धंधे का बहुत अधिक काम मौखिक रूप से होता है। हालांकि सूदखोरों द्वारा कर्ज लेने वालों पर दबाव बनाने के लिये स्टैंप पेपर पर लिखित ले लिया जाता है और गंभीर तथा डरावनी शर्ते थोप दी जाती हैं। वैसे तो सूदखोरों का जाल नगर निगम तथा अन्य संस्थानों में फैला हुआ लेकिन रेलवे में इस कारोबार की जड़ें कितनी गहरी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। वेतन दिवस पर सूदखोरों द्वारा कर्जदारों से वसूली के लिए किया जाने वाला तांडव किसी से छिपा नहीं है। रेलवे सुरक्षा आयुक्त रहे डीआईजी बृजलाल ने अपने कार्यकाल में सूदखोरों के खिलाफ अभियान चलाकर इसके कारोबारियों पर अंकुश लगाने का सार्थक प्रयास भी किया लेकिन उनके यहां से जाने के बाद सूदखोर फिर पहले वाली स्थिति में पहंुच गये हैं।
शनिवार, 16 मई 2009
मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी
आनंद राय , गोरखपुर
राम दरश मिश्रा जी गोरखपुर कछार इलाके के हैं। अब दिल्ली के हो गए हैं। कभी कभी यहाँ आते हैं तो पूरी तरह रच बस जाते हैं। मिडल तक पढाई के दौरान नदी तैर कर स्कूल जाते थे लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। उनकी लेखनी सबके लिए प्रेरित करने वाली है। इस चुनाव परिणाम ने कई लोगों की नीद उड़ा दी है और लोग उदास हो गए हैं। उनके लिए यह रचना तसल्ली का पैमाना बनेगी।
दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी
कविता बोली- "मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।
"गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा
टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा
कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!
जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा
लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा
फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!
सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलकजाना है
उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थकखोजो यारो,
सूने में भी कोई राह गई होगी!
टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते
शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते
फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!
राम दरश मिश्रा जी गोरखपुर कछार इलाके के हैं। अब दिल्ली के हो गए हैं। कभी कभी यहाँ आते हैं तो पूरी तरह रच बस जाते हैं। मिडल तक पढाई के दौरान नदी तैर कर स्कूल जाते थे लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। उनकी लेखनी सबके लिए प्रेरित करने वाली है। इस चुनाव परिणाम ने कई लोगों की नीद उड़ा दी है और लोग उदास हो गए हैं। उनके लिए यह रचना तसल्ली का पैमाना बनेगी।
दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी
कविता बोली- "मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।
"गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा
टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा
कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!
जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा
लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा
फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!
सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलकजाना है
उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थकखोजो यारो,
सूने में भी कोई राह गई होगी!
टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते
शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते
फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!
गुरुवार, 14 मई 2009
आग और ख़ून के इस दलदल में
आनंद राय , गोरखपुर
अभी हिन्दू और मुसलमान का भेद ख़त्म नही हुआ। इस बार भी चुनाव में दोनों को बांटने की खूब सियासत हुई। नरेन्द्र मोदी के नए अवतार वरुण गांधी ने मीडिया को खूब लुभाया। मेनका गांधी ने पीलीभीत में अपने करीबी मुसलमान समर्थकों को बोल दिया १३ मई तक कोई वरुण के करीब न जाए। उन्होंने बेटे को चुनाव जिताने के लिए मुसलमान वोटों को बांटने का कुचक्र किया। यह बात राजनीतिक समीक्षक कहने लगे हैं। चुनाव में हार जीत अलग बात है लेकिन नफरत का जो जहर आम आदमी के दिलों में बोया जा रहा है उसकी फसल कैसी उगेगी यह सियासत करने वाले नही सोच रहे हैं। आज राही मासूम रजा की याद आ रही है। वे हिन्दू और मुसलमान से ऊपर इंसानी कौम को बचाए रखने के लिए तत्पर थे। उनकी यह रचना मौजू लगती है-
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
सीखो नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं
रामधारी सिंह दिनकर
सीखो नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं,जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ;या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो।ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के?गांधी को उल्टा घिसो और जो धूल झरे,उसके प्रलेप से अपनी कुण्ठा के मुख पर,ऐसी नक्काशी गढो कि जो देखे, बोले,आखिर , बापू भी और बात क्या कहते थे?डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों,मत चिढो,ध्यान मत दो इन छोटी बातों परकल्पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर,वह भला कहां तक ठोस कदम धर सकता है?औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में,तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगीयह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया,प्यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।
सोमवार, 11 मई 2009
आखिर कहां भटक गयी रामगढ़ ताल की दवा

मिथिलेश द्विवेदी, गोरखपुर
मैं रामगढ़ ताल हूं। कहते हैं कि नदी-नाले, ताल-तलैये कभी बूढ़े नहीं होते। मगर अनियोजित विकास ने मुझे समय से पहले बूढ़ा और बीमार बना दिया। बताते हैं कि मुझे यूट्राफिकेशन आफ लेक नामक बीमारी है। सुना है अब तक देश में जितने भी झील व तालाबों की मौत हुई उन्हें यही बीमारी हुई थी। लगता है मेरा भी अंत आ गया है। मैं मर भले ही जाऊं मगर मेरी आत्मा उद्धार के लिए छटपटाती रहेगी। आने वाली पीढि़यां मेरी मौत के जिम्मेदार लोगों को कभी माफ नहीं करेंगी। एक समय था जब शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ दूल्हा बनकर हमारे तट पर उतरे और राजकुमारी यशोधरा को अपनी दुल्हन बना कर ले गये थे। यही सिद्धार्थ आगे बुद्ध बन कर इतिहास और काल की धरोहर बन गये लेकिन मुझे सभी ने भुला दिया। सम्राट हर्ष के समय भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक सीयूकी में हमारा बखान किया लेकिन आज अपनों को ही मैं याद नहीं। दशकों पहले 17 सौ एकड़ की भूमि भी मेरी अंगड़ाई झेल नहीं पाती थी। मेरा निर्मल जल न केवल आस-पास के वातावरण को शीतल बनाता था वरन अठखेलिया करती मेरी लहरें लोगों में उत्साह व उमंग भर देती थीं। लोग मेरे तट को चांदनी रात में घंटों निहारते नहीं अघाते थे। वाकई तब मेरा स्वच्छ जल आसमान के चांद को भी अपने अंक में समेटने की कूवत रखता था। यूं कहें कि मेरे अंक में सिमटने के बाद चांद को भी इठलाने की वजह मिल जाती थी। मेरी ममता की छांव में पलने वाली मछलियां व अन्य जीव जंतु लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र थे। वह कहां से आते थे मुझे नहीं पता, मगर मेरी गोद में आकर उन्हें वह लाड़-दुलार मिलता था जो केवल मां से ही मिलता है। मेरी ममता की छांव मछलियों को अलग पहचान दिलाता था। तभी तो मेरी गोद सदा भरी रही। जाने कितने लोगों की जीविका मेरी वजह से चली। मैंने जाने कितनों का पेट पाला। मेरे नाम पर गोरखपुर शहर भी कभी गर्व करता था। मगर अनियोजित विकास ने मेरा अंग-अंग तोड़ डाला। मेरे सीने पर पत्थर चलाए गए और रोलर से मिट्टी पाट कर मेरा विस्तार बौना कर दिया गया। मुझे अनगिनत जगह से काटा गया। आज मुझे जबरन सिकोड़ कर महज 25 एकड़ का बना दिया गया। 90 के दशक में मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने मेरी सुधि ली। इलाज की पहल हुई, लेकिन लखनऊ से चली दवा रास्ता भटक गयी। आज तक मैं जीवन रक्षक दवा की प्रतीक्षा कर रहा हूं। जिस शहर को मैंने इतराने की वजह दी उसने मुझे इतने घाव दिए कि मेरा रोम-रोम टीस रहा है। हद तो यह कि मेरी जीवन रक्षक वाली पहचान भी मिट गई। इस शहर ने मुझे अपनों का ही हत्यारा बना डाला। जिन मछलियों को अपनी गोद में पालता रहा उन्हीं के खून से हाथ रंग लिए। इस खून के छींटे शहर के माथे पर भी चस्पा हैं। क्योंकि मुझे इस हालत में पहुंचाने के लिए एक मात्र जिम्मेदार शहर का अनियोजित विकास व मेरे भीतर हर रोज उड़ेला जाने वाला लाखों लीटर मल- जल है। सुना है झीलों के शहर भोपाल (मध्य प्रदेश) की लाइफ लाइन बड़ी झील की दशा भी छह महीने पहले तक मेरे आज के हालात जैसी ही थी। वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद वहां प्रतिदिन एक से डेढ़ घंटे तक श्रमदान की घोषणा की और उनकी प्रेरणा से बड़ी झील को जीवन रक्षक दवा मिल गयी। ऐसा नहीं कि गोरखपुर में शिवराज जैसे दृढ़ इच्छा शक्ति वाले व प्रेरणा दायक नेताओं या अफसरों की कमी है। मगर मुझे लगता है कि मेरी मौत के बाद उन्हें मेरी सुधि आएगी। जीते-जी मैं उनके लिए मुद्दा नहीं बन सका इसका मुझे अफसोस है।
मुहब्बत किया तो उजड़ जाएगा घर

अभयानंद कृष्ण, महराजगंज
गलियों में वही लड़के, हाथों में वही पत्थर क्या लोग मुहब्बत को हर दौर में मारेंगे? अनवर नदीम के इस सवाल का जवाब यहां बंजारा बस्ती में हां है। खुद के नियम- कानून से संचालित इनके धरम-करम में मुहब्बत गुनाह है। जज्बातों पर पहरेदार उनकी हुकूमत में दिल की धड़कनों का हिसाब होता है। अगर कोई दिल मुहब्बत करने की गलती कर बैठे तो उसे जो सजा सुनायी जाती है,उसकी ताउम्र पीछा करती है। नगर की सीमा से सटे सुकठिया टोला में बसी बंजारों की बस्ती कई अजीबो-गरीब अफसानों को अपनी पहचान में समेटे है। जहां शादी-ब्याह की रोचक रीतियां अनोखे पन का एहसास कराती हैं। वहीं भावनाओं की दस्तक पर इनके दरवाजे से जवाब में सजा का फरमान है। दो साल पहले इस कबीलाई हुक्म का शिकार अरशद और हासरुन बने। इन दोनों ने एक दूसरे से प्यार कर लिया था। समुदाय में कभी मुखिया रहे अमीर बंजारा बताते हैं कि दोनों को अपनी गलती कबूल करने के लिए पंचायत ने काफी कोशिशें कीं,लेकिन वे साथ छोड़ना नहीं पसंद किए। तब पंचायतन हुक्का-पानी बंद कर उन्हें भैंस घोषित कर दिया गया। प्यार की सजा का इनका अंदाज भी कम अनोखा नहीं है। गोत्र के भीतर अगर दो दिल एक दूसरे के साथ देख लिए गए तो उनकी बुरी दशा की जाती है। पहले प्यार करने की सजा दी जाती है। अगर दोनों शादी करके लौटे तब तो खैर नहीं। स्थानीय स्तर पर पंचायत बैठकर उन्हें इस गुनाह के लिए दंडित किया जाता है। स्थानीय पंचायत उन्हें कुनबे से बाहर का रास्ता दिखा देती है। इसके पहले प्यार के दो परवानों से उनकी बात पूछी जांची जाती है। फिर पंच अपना निर्णय जांच के बाद सुनाते हैं। लेकिन अगर मुहब्बत करने वाले इसे गुनाह के रूप में स्वीकार तौबा कर लें तो पंचायत उन्हें कबूल भी कर लेती है। इस पंचायत की बात न मानने पर उन्हें कुनबा की बड़ी पांत में पेश होने का हुक्म दिया जाता है। यह सिलसिला बहराइच से होते हुए बाराबंकी तक जारी रहता है। पंचायत का सारा खर्च प्यार के गुनहगार उठाते हैं। यह सजा का एक और रुख है। समझाने-बुझाने के लिहाज से शुरू पंचायत का अंत दिवानों को जाति से बाहर होकर चुकाना पड़ता है तब न इनकी कोई जाति रह जाती है न धर्म। इन दिनों कुनबा में मुखिया का धर्म निभा रहे हदीस बंजारा कहते हैं कि अपने बीच का मामला हम लोग पुलिस तक नहीं ले जाते क्योंकि इसमें इज्जत के रुसवा होने का सवाल है। पर्दा और नेकनीयती पर आधारित अपने धरम-करम में ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं होती।
राह पकड़ तू एक चला चल पा जायेगा मधुशाला
नवनीत प्रिय प्रकाश त्रिपाठी, गोरखपुर
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, किस पथ से जाऊं? असमंजस है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूं, राह पकड़ तू एक चला चल, पा जायेगा मधुशाला। महाकवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कृति मधुशाला में ये पक्तियां चाहे जिस संदर्भ में लिखी हो लेकिन गोरखपुर जनपद में कुटीर उद्योग का रूप ले चुके कच्ची शराब के धंधे पर ये बिल्कुल सटीक बैठती हैं। यकीन मानिये, गांव हो या शहर, कोई भी रास्ता पकड़ कर चलते रहिये, एकाध किलोमीटर चलने के बाद कच्ची शराब का ठीहा जरूर मिल जायेगा। जिले में हर जगह कच्ची का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है। ग्रामीण ही नहीं शहरी क्षेत्र में भी कई ऐसे थाने हैं जहां कारोबारियों के साथ ही साथ पुलिस वालों के लिये भी यह धंधा मोटी कमाई का जरिया बना हुआ है। इस धंधे को रोकने के लिये बनाये गये आबकारी विभाग पर सरकार के वार्षिक बजट का बड़ा हिस्सा भले ही खर्च होता है लेकिन धंधेबाजों से इस विभाग के लोगों की मिली भगत किसी से छिपी बात नहीं है। पुलिस वालों के नजरिये से अच्छा थाना कहे जाने वाले ग्रामीण क्षेत्र में झगहा, चौरीचौरा, पिपराइच, खजनी, कैंपियरगंज और शहरी क्षेत्र में खोराबार, गुलरिहा, शाहपुर, राजघाट, तिवारीपुर, कैंट जैसे थानों में तैनाती के लिये पुलिस वालों के बीच मारामारी के पीछे एक बड़ी वजह यही है। सूत्रों के मुताबिक इन थाना क्षेत्रों में इस धंधे से नियमित रूप से मिलने वाली मोटी रकम आंखे चुधियाने वाली हैं। इन थानों के अलग-अलग हल्कों में तैनात सिपाहियों की संख्या से भी इस धंधे की कमाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। किसी थाने के जिस हल्के में यह धंधा जितने बड़े पैमाने पर होता है वहां सिपाहियों की संख्या उतनी ही अधिक होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ईट भट्ठे इस कारोबार का प्रमुख अड्डा बने हुए हैं। इसके अलावा नदी के किनारे और दूर-दराज के क्षेत्रों में भी यह धंधा बड़े पैमाने पर होता है। शहरी क्षेत्र में नदी का किनारा इस धंधे का मुख्य केन्द्र है। इसके साथ ही शहर से लगे कुसम्हीं जंगल में धंधा खूब फल-फूल रहा है। राजघाट क्षेत्र की अमुरतानी तो पहले से ही इस कारोबार के लिये बदनाम है। विभाग से जुड़े भरोसे मंद सूत्रों के मुताबिक इस काले कारोबार से होने वाली कमाई में सबका हिस्सा बंधा होता है। यही हाल आबकारी विभाग का भी है। कारोबारी हर क्षेत्र में तैनात आबकारी विभाग के कर्मचारियों का हिस्सा पूरी ईमानदारी से उनके पास पहंुचा देते हैं। कभी कभार दिखावे के लिये ही सही कार्रवाई का दबाव पड़ने पर पुलिस या आबकारी विभाग के कर्मचारियों के कहने पर धंधेबाज अपने परिवार के एक व्यक्ति को पांच या दस लीटर कच्ची शराब के साथ भेजे देते हैं। साठ आबकारी एक्ट के तहत उनका चालान होता है और आबकारी अधिनियम के तहत उन्हें थाने से ही जमानत दे दी जाती है।
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, किस पथ से जाऊं? असमंजस है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूं, राह पकड़ तू एक चला चल, पा जायेगा मधुशाला। महाकवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कृति मधुशाला में ये पक्तियां चाहे जिस संदर्भ में लिखी हो लेकिन गोरखपुर जनपद में कुटीर उद्योग का रूप ले चुके कच्ची शराब के धंधे पर ये बिल्कुल सटीक बैठती हैं। यकीन मानिये, गांव हो या शहर, कोई भी रास्ता पकड़ कर चलते रहिये, एकाध किलोमीटर चलने के बाद कच्ची शराब का ठीहा जरूर मिल जायेगा। जिले में हर जगह कच्ची का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है। ग्रामीण ही नहीं शहरी क्षेत्र में भी कई ऐसे थाने हैं जहां कारोबारियों के साथ ही साथ पुलिस वालों के लिये भी यह धंधा मोटी कमाई का जरिया बना हुआ है। इस धंधे को रोकने के लिये बनाये गये आबकारी विभाग पर सरकार के वार्षिक बजट का बड़ा हिस्सा भले ही खर्च होता है लेकिन धंधेबाजों से इस विभाग के लोगों की मिली भगत किसी से छिपी बात नहीं है। पुलिस वालों के नजरिये से अच्छा थाना कहे जाने वाले ग्रामीण क्षेत्र में झगहा, चौरीचौरा, पिपराइच, खजनी, कैंपियरगंज और शहरी क्षेत्र में खोराबार, गुलरिहा, शाहपुर, राजघाट, तिवारीपुर, कैंट जैसे थानों में तैनाती के लिये पुलिस वालों के बीच मारामारी के पीछे एक बड़ी वजह यही है। सूत्रों के मुताबिक इन थाना क्षेत्रों में इस धंधे से नियमित रूप से मिलने वाली मोटी रकम आंखे चुधियाने वाली हैं। इन थानों के अलग-अलग हल्कों में तैनात सिपाहियों की संख्या से भी इस धंधे की कमाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। किसी थाने के जिस हल्के में यह धंधा जितने बड़े पैमाने पर होता है वहां सिपाहियों की संख्या उतनी ही अधिक होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ईट भट्ठे इस कारोबार का प्रमुख अड्डा बने हुए हैं। इसके अलावा नदी के किनारे और दूर-दराज के क्षेत्रों में भी यह धंधा बड़े पैमाने पर होता है। शहरी क्षेत्र में नदी का किनारा इस धंधे का मुख्य केन्द्र है। इसके साथ ही शहर से लगे कुसम्हीं जंगल में धंधा खूब फल-फूल रहा है। राजघाट क्षेत्र की अमुरतानी तो पहले से ही इस कारोबार के लिये बदनाम है। विभाग से जुड़े भरोसे मंद सूत्रों के मुताबिक इस काले कारोबार से होने वाली कमाई में सबका हिस्सा बंधा होता है। यही हाल आबकारी विभाग का भी है। कारोबारी हर क्षेत्र में तैनात आबकारी विभाग के कर्मचारियों का हिस्सा पूरी ईमानदारी से उनके पास पहंुचा देते हैं। कभी कभार दिखावे के लिये ही सही कार्रवाई का दबाव पड़ने पर पुलिस या आबकारी विभाग के कर्मचारियों के कहने पर धंधेबाज अपने परिवार के एक व्यक्ति को पांच या दस लीटर कच्ची शराब के साथ भेजे देते हैं। साठ आबकारी एक्ट के तहत उनका चालान होता है और आबकारी अधिनियम के तहत उन्हें थाने से ही जमानत दे दी जाती है।
रविवार, 10 मई 2009
मरघट
मरघट। नाम सुन कर ही कड़वाहट। मगर सच कहें तो अब जिंदा लोग बचे ही कहाँ। सबके सब मरे हुए। सब बेजान। अपनी अपनी लाश को अपने अपने कन्धों पर उठाये हुए। ऐसे लोगों के लिए कौन सी जगह रखी जाय। कौन सी जगह उन्हें आश्रय दे सकती है और ऐसे लोगों को विश्राम कहाँ मिल सकता है। इन मरे हुए लोगों के संस्कार की भी तो जरूरत है ताकि इनकी पापी आत्मा भटके न। यह मरघट मरे हुए लोगों को संस्कारित करेगा। मुझे उम्मीद है उन जिंदा लोगों से जो अपनी साँस को बचाए रखने में कामयाब हैं। मरघट पर आने वालों को संस्कारित करने में मुझे उनकी मदद की दरकार है। हमारी यह भावना सिर्फ़ शब्दों की जुगाली भर नही है बल्कि एक प्रयास है। यह प्रयास सच्चे मन से है और यकीन है कि इसकी गरिमा बनी रहेगी।
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