
अभयानंद कृष्ण, महराजगंज
गलियों में वही लड़के, हाथों में वही पत्थर क्या लोग मुहब्बत को हर दौर में मारेंगे? अनवर नदीम के इस सवाल का जवाब यहां बंजारा बस्ती में हां है। खुद के नियम- कानून से संचालित इनके धरम-करम में मुहब्बत गुनाह है। जज्बातों पर पहरेदार उनकी हुकूमत में दिल की धड़कनों का हिसाब होता है। अगर कोई दिल मुहब्बत करने की गलती कर बैठे तो उसे जो सजा सुनायी जाती है,उसकी ताउम्र पीछा करती है। नगर की सीमा से सटे सुकठिया टोला में बसी बंजारों की बस्ती कई अजीबो-गरीब अफसानों को अपनी पहचान में समेटे है। जहां शादी-ब्याह की रोचक रीतियां अनोखे पन का एहसास कराती हैं। वहीं भावनाओं की दस्तक पर इनके दरवाजे से जवाब में सजा का फरमान है। दो साल पहले इस कबीलाई हुक्म का शिकार अरशद और हासरुन बने। इन दोनों ने एक दूसरे से प्यार कर लिया था। समुदाय में कभी मुखिया रहे अमीर बंजारा बताते हैं कि दोनों को अपनी गलती कबूल करने के लिए पंचायत ने काफी कोशिशें कीं,लेकिन वे साथ छोड़ना नहीं पसंद किए। तब पंचायतन हुक्का-पानी बंद कर उन्हें भैंस घोषित कर दिया गया। प्यार की सजा का इनका अंदाज भी कम अनोखा नहीं है। गोत्र के भीतर अगर दो दिल एक दूसरे के साथ देख लिए गए तो उनकी बुरी दशा की जाती है। पहले प्यार करने की सजा दी जाती है। अगर दोनों शादी करके लौटे तब तो खैर नहीं। स्थानीय स्तर पर पंचायत बैठकर उन्हें इस गुनाह के लिए दंडित किया जाता है। स्थानीय पंचायत उन्हें कुनबे से बाहर का रास्ता दिखा देती है। इसके पहले प्यार के दो परवानों से उनकी बात पूछी जांची जाती है। फिर पंच अपना निर्णय जांच के बाद सुनाते हैं। लेकिन अगर मुहब्बत करने वाले इसे गुनाह के रूप में स्वीकार तौबा कर लें तो पंचायत उन्हें कबूल भी कर लेती है। इस पंचायत की बात न मानने पर उन्हें कुनबा की बड़ी पांत में पेश होने का हुक्म दिया जाता है। यह सिलसिला बहराइच से होते हुए बाराबंकी तक जारी रहता है। पंचायत का सारा खर्च प्यार के गुनहगार उठाते हैं। यह सजा का एक और रुख है। समझाने-बुझाने के लिहाज से शुरू पंचायत का अंत दिवानों को जाति से बाहर होकर चुकाना पड़ता है तब न इनकी कोई जाति रह जाती है न धर्म। इन दिनों कुनबा में मुखिया का धर्म निभा रहे हदीस बंजारा कहते हैं कि अपने बीच का मामला हम लोग पुलिस तक नहीं ले जाते क्योंकि इसमें इज्जत के रुसवा होने का सवाल है। पर्दा और नेकनीयती पर आधारित अपने धरम-करम में ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं होती।
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