हिंदी पत्रकारिता में धार व धाक, आंदोलन-अभियान, प्रयोग-प्रखरता, जवाबदेही और जुनून के प्रबल पक्षधर विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे। दैनिक जागरण, लखनऊ के पूर्व स्थानीय संपादक श्री शुक्ल ने सोमवार सुबह संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतिम सांस ली जहां रविवार को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें भर्ती कराया गया था। लंबे कालखंड तक उनकी कर्मभूमि रही कानपुर में पवित्र गंगातट पर शाम को उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके शोकसंतप्त परिवार में पत्नी, पुत्र और पुत्री हैं। वाराणसी के एक साहित्यिक-संस्कारी परिवार में 19 नवंबर, 1941 को जन्मे श्री शुक्ल ने 1963 में दैनिक आज वाराणसी से वास्तविक अखबार प्रबंधन का सफर शुरू किया और करीब 45 वर्षो बाद वर्ष 2008 में दैनिक जागरण, लखनऊ के स्थानीय संपादक पद से सेवानिवृत्त हुए। साढ़े चार दशक का ये कालखंड उनके लिए सतत अभियान जैसा रहा। दरअसल उन्होंने पूरा जीवन ही अभियान पुरुष की तरह जिया, वह कभी रुके नहीं, थके नहीं। उनके लिए वास्तविक अखबार प्रबंधन का शब्द प्रयोग इसलिए किया जाना चाहिए कि खबर से लेकर विज्ञापन, प्रसार, छपाई की तकनीक सरीखी अखबार प्रबंधन की हर विधा में उन्होंने अपनी क्षमता और स्वप्नशीलता से खुद को पारंगत सिद्ध किया। आज और दैनिक जागरण की तमाम शाखाओं-प्रशाखाओं की स्थापना में वह सक्रिय माध्यम रहे। वह अपनों के भैया थे और उनके लिए पराया तो कोई था ही नहीं। भीड़ में प्रतिभा को पहचान लेते थे, प्रतिभा में छिपी विशिष्टता को जान लेते थे और विशिष्टता को सही दिशा में सान (धार) देते थे। उनके हाथों गढ़े गए असंख्य होनहार आज पत्रकारिता जगत में हस्ताक्षर और हस्ती का विशेषण धारण किये हुए हैं। यही वजह है कि हिंदी पत्रकारिता को जनोन्मुखी आंदोलन की शक्ल देने के लिए उनके द्वारा किये गए प्रयोगों की छाप दैनिक जागरण समूह के अलावा उन तमाम हिंदी अखबारों में भी देखी जाती है, जहां उनके सान्नि्ध्य में सीख लेने वाले तमाम प्रशिक्षु, संपादकों-प्रबंधकों के दायित्व निभा रहे हैं। वह संस्कार व परंपरा के प्रबल आग्रही थे, तो नई तकनीक व परिकल्पना के चितेरे। आपातकाल, अयोध्या विवाद, तथा चंबल के बीहड़ों में दस्यु समर्पण संबंधी आपरेशनों में अखबारी सरोकारों को लेकर उनकी सक्रिय संवेदनशीलता अविस्मरणीय है। देश भर में दैनिक जागरण के कार्यालयों में शोक सभाओं के जरिए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये गए।
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