शनिवार, 16 मई 2009

मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी

आनंद राय , गोरखपुर
राम दरश मिश्रा जी गोरखपुर कछार इलाके के हैं। अब दिल्ली के हो गए हैं। कभी कभी यहाँ आते हैं तो पूरी तरह रच बस जाते हैं। मिडल तक पढाई के दौरान नदी तैर कर स्कूल जाते थे लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। उनकी लेखनी सबके लिए प्रेरित करने वाली है। इस चुनाव परिणाम ने कई लोगों की नीद उड़ा दी है और लोग उदास हो गए हैं। उनके लिए यह रचना तसल्ली का पैमाना बनेगी।
दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी
कविता बोली- "मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।
"गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा
टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा
कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!
जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा
लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा
फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!
सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलकजाना है
उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थकखोजो यारो,
सूने में भी कोई राह गई होगी!
टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते
शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते
फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!

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