गुरुवार, 14 मई 2009

आग और ख़ून के इस दलदल में


आनंद राय , गोरखपुर

अभी हिन्दू और मुसलमान का भेद ख़त्म नही हुआ। इस बार भी चुनाव में दोनों को बांटने की खूब सियासत हुई। नरेन्द्र मोदी के नए अवतार वरुण गांधी ने मीडिया को खूब लुभाया। मेनका गांधी ने पीलीभीत में अपने करीबी मुसलमान समर्थकों को बोल दिया १३ मई तक कोई वरुण के करीब न जाए। उन्होंने बेटे को चुनाव जिताने के लिए मुसलमान वोटों को बांटने का कुचक्र किया। यह बात राजनीतिक समीक्षक कहने लगे हैं। चुनाव में हार जीत अलग बात है लेकिन नफरत का जो जहर आम आदमी के दिलों में बोया जा रहा है उसकी फसल कैसी उगेगी यह सियासत करने वाले नही सोच रहे हैं। आज राही मासूम रजा की याद आ रही है। वे हिन्दू और मुसलमान से ऊपर इंसानी कौम को बचाए रखने के लिए तत्पर थे। उनकी यह रचना मौजू लगती है-

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

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