नवनीत प्रकाश त्रिपाठी, गोरखपुर
शहर के सैकड़ों परिवार सूदखोरों के बुने ताने-बाने में बुरी तरह से जकड़े हुये हैं। अपनी ऊंची रसूख और पैसे के बल पर वसूली के लिये ये रोज नियम, कानून की धज्जियां उड़ाते हैं। यही नहीं सूदखोरों द्वारा वसूली के लिये हर जायज, नाजायज तौर तरीकों का प्रयोग किया जाता है। सूदखोरों को उन नेताओं और माफियाओं द्वारा पूरा समर्थन दिया जाता है जो इस धंधे में पैसा लगाकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। पता नहीं क्यों उनकी इन हरकतों पर प्रशासन खामोशी अख्तियार किये है। रेलवे के सिग्नल वर्कशाप में कार्यरत विनोद कुमार सिंह की शनिवार को सूदखोर और उसके साथियों द्वारा खुलेआम पिटाई और बाद में गोली मार कर उसकी हत्या करने की कोशिश के बाद शहर में बड़े पैमाने चल रहा यह गोरखधंधा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पता चला है कि किस तरह सूदखोर कर्जदारों से मनमाने दर से ब्याज वसूल करते हैं। बताते हैं कि धंधेबाज लिखा पढ़ी में तो बंैक के ब्याज दर पर उधार देते हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर इन सूदखोरों द्वारा 50 से 150 प्रतिशत तक ब्याज वसूला जाता है। सबसे बड़ी बात यह कि इस धंधे का बहुत अधिक काम मौखिक रूप से होता है। हालांकि सूदखोरों द्वारा कर्ज लेने वालों पर दबाव बनाने के लिये स्टैंप पेपर पर लिखित ले लिया जाता है और गंभीर तथा डरावनी शर्ते थोप दी जाती हैं। वैसे तो सूदखोरों का जाल नगर निगम तथा अन्य संस्थानों में फैला हुआ लेकिन रेलवे में इस कारोबार की जड़ें कितनी गहरी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। वेतन दिवस पर सूदखोरों द्वारा कर्जदारों से वसूली के लिए किया जाने वाला तांडव किसी से छिपा नहीं है। रेलवे सुरक्षा आयुक्त रहे डीआईजी बृजलाल ने अपने कार्यकाल में सूदखोरों के खिलाफ अभियान चलाकर इसके कारोबारियों पर अंकुश लगाने का सार्थक प्रयास भी किया लेकिन उनके यहां से जाने के बाद सूदखोर फिर पहले वाली स्थिति में पहंुच गये हैं।
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